बिहार लाइब्रेरियन भर्ती को लेकर 6500+ पदों पर महाआंदोलन, उमड़ा गुस्सा
पटना, 25 अगस्त 2025:
बिहार में लंबे समय से लंबित पड़ी लाइब्रेरियन भर्ती (LET - Librarian Eligibility Test) को लेकर अब विद्यार्थियों और अभ्यर्थियों का सब्र टूट चुका है। राज्य भर से हजारों की संख्या में उम्मीदवार एकजुट होकर महाआंदोलन करने पटना की सड़कों पर उतर आए हैं। आंदोलन की सबसे बड़ी मांग है कि सरकार तुरंत लाइब्रेरियन भर्ती परीक्षा (LET) आयोजित करे और करीब 6500 से अधिक रिक्त पदों पर नियुक्ति प्रक्रिया शुरू करे।
आंदोलन की मुख्य बातें
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स्लोगन:
"LET नहीं तो वोट नहीं" – यही नारा इस आंदोलन का मुख्य चेहरा बन गया है। -
तारीख और स्थान:
आंदोलन की घोषणा के अनुसार, 25 अगस्त को पटना यूनिवर्सिटी की सेंट्रल लाइब्रेरी से काफिला कूचेगा और कारगिल चौक तक मार्च निकाला जाएगा। -
अभ्यर्थियों की संख्या:
प्रारंभिक आकलन के अनुसार, राज्यभर से हजारों अभ्यर्थी इस आंदोलन में शामिल हो रहे हैं। -
मांगें:
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बिहार सरकार जल्द से जल्द LET परीक्षा की अधिसूचना जारी करे।
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6500+ रिक्त पदों पर नियमित नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू की जाए।
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शिक्षा व्यवस्था में लाइब्रेरियन पद को उचित सम्मान और स्थायित्व मिले।
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आंदोलन की पृष्ठभूमि
बिहार में लंबे समय से लाइब्रेरियन पदों की बहाली अटकी हुई है। अभ्यर्थियों का कहना है कि सरकार ने कई बार आश्वासन तो दिया, लेकिन भर्ती प्रक्रिया को लेकर अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
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स्कूलों और कॉलेजों में लाइब्रेरी की स्थिति बेहद खराब है क्योंकि योग्य लाइब्रेरियन की कमी है।
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कई संस्थानों में लाइब्रेरियन के पद वर्षों से खाली पड़े हैं, जिससे छात्रों को पढ़ाई में असुविधा होती है।
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अभ्यर्थियों का कहना है कि अगर सरकार अब भी चुप रही तो आंदोलन और व्यापक रूप लेगा।
छात्रों की आवाज़
आंदोलन में शामिल एक छात्र का कहना था:
"हमने वर्षों मेहनत की है, डिग्री और कोर्स पूरे किए हैं। लेकिन सरकार भर्ती को लेकर गंभीर नहीं है। हमें मजबूर होकर सड़कों पर उतरना पड़ा है। अब हम पीछे हटने वाले नहीं हैं।"
दूसरे अभ्यर्थी ने कहा:
"अगर सरकार हमें रोजगार नहीं देती है तो हम भी चुनाव में अपनी ताकत दिखाएंगे। हमारा नारा है – LET नहीं तो वोट नहीं।"
सामाजिक और राजनीतिक असर
यह आंदोलन केवल रोजगार तक सीमित नहीं है, बल्कि अब यह राजनीतिक रंग भी लेने लगा है। विधानसभा और लोकसभा चुनावों के करीब आते ही यह मुद्दा सत्ताधारी दल और विपक्ष दोनों के लिए चुनौती बन गया है।
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युवाओं की बेरोजगारी बिहार का बड़ा मुद्दा रहा है।
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विपक्षी दल इस आंदोलन को सरकार की नाकामी बताकर भुनाने की कोशिश में हैं।
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सत्ताधारी दल पर युवाओं को रोजगार देने का दबाव बढ़ गया है।
आंदोलन का स्वरूप
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प्रदर्शन स्थल: पटना यूनिवर्सिटी सेंट्रल लाइब्रेरी से कारगिल चौक तक पैदल मार्च।
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नेतृत्व: कई युवा संगठन और छात्र नेता इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं।
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सोशल मीडिया अभियान: ट्विटर, फेसबुक और यूट्यूब पर #LET_नहीं_तो_वोट_नहीं और #BiharLibrarianMovement ट्रेंड कर रहा है।
सरकार की प्रतिक्रिया
अब तक सरकार की ओर से कोई औपचारिक बयान सामने नहीं आया है। शिक्षा विभाग के सूत्रों का कहना है कि भर्ती प्रक्रिया पर विचार चल रहा है, लेकिन आधिकारिक नोटिफिकेशन जारी करने में अभी समय लग सकता है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर सरकार ने जल्द ही कोई ठोस कदम नहीं उठाया तो यह आंदोलन और बड़ा रूप ले सकता है और चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकता है।
शिक्षा पर असर
लाइब्रेरियन भर्ती केवल अभ्यर्थियों का मसला नहीं है, बल्कि यह पूरे शिक्षा तंत्र से जुड़ा हुआ है।
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स्कूल और कॉलेजों में लाइब्रेरी की कमी छात्रों की पढ़ाई को प्रभावित करती है।
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लाइब्रेरियन की अनुपस्थिति में छात्रों को गुणवत्तापूर्ण अध्ययन सामग्री और रिसर्च गाइडेंस नहीं मिल पाती।
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यह सीधे-सीधे राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के उद्देश्यों पर सवाल खड़ा करता है, जिसमें लाइब्रेरी और रिसोर्स-सेंट्रिक शिक्षा पर जोर दिया गया है।
आंदोलन का महत्व
यह आंदोलन बिहार ही नहीं बल्कि पूरे देश के लाइब्रेरियन समुदाय के लिए एक प्रेरणा है।
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यह पहली बार है जब इतने बड़े पैमाने पर लाइब्रेरियन अभ्यर्थी सड़क पर उतरे हैं।
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इससे साबित होता है कि शिक्षा और पुस्तकालय सेवाओं को अब नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
निष्कर्ष
बिहार का महाआंदोलन अब सिर्फ रोजगार की मांग नहीं रहा, बल्कि यह युवाओं की नाराज़गी और हक की लड़ाई का प्रतीक बन गया है।
6500+ पदों की भर्ती की मांग जायज़ है और इससे न केवल हजारों बेरोजगारों को रोजगार मिलेगा, बल्कि शिक्षा व्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।
अभ्यर्थियों का साफ कहना है –
👉 अगर सरकार ने अब भी उनकी मांगें नहीं मानीं तो वे आंदोलन को और तेज करेंगे।
👉 और चुनाव के समय इसका राजनीतिक असर साफ दिखेगा।
✍️ रिपोर्ट: राहुल सर टीम
📍 स्थान: पटना, बिहार
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